Monday, October 7, 2019

कान का बहना

कान का बहना

कान का बहना मवाद जैसा या पानी के समान बहना, कान बहने के कुछ आम प्रकार हैं। बहाव तीव्र या पुराना हो सकता है। कान बहना बच्चों, किशोरों , किशोरियों, कुपोषित बच्चों (क्‍वाशिओर्कर, मरास्‍मस से प्रभावित) एवं अस्वास्थ्यकर क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों में आम हैं। कारण :- सामान्‍य सर्दी-जुकाम के साथ माध्यमिक बैक्टीरियल संक्रमणों की जटिलता। लक्षण :- क या दोनों कानों में दर्द गंध के साथ बहाव बुखार उपचार - सामान्यतः कान से मवाद आने को मरीज गंभीरता से नहीं लेता, इसे अत्यंत गंभीरता से लेना चाहिए अन्यथा यह कभी-कभी गंभीर व्याधियों जैसे मेनिनजाइटिस एवं मस्तिष्क के एक विशेष प्रकार के कैंसर को उत्पन्न कर सकता है। कान में मवाद किसी भी उम्र में आ सकता है। कान से मवाद आने का स्थान मध्य कर्ण का संक्रमण है। मध्य कर्ण में सूजन होकर, पककर पर्दा फटकर मवाद आने लगता है। मध्य कान में संक्रमण पहुँचने के तीन रास्ते हैं, जिसमें 80-90 प्रश कारण गले से कान जोड़ने वाली नली है। इसके द्वारा नाक एवं गले की सामान्य सर्दी-जुकाम, टांसिलाइटिस, खाँसी आदि कारणों से मध्य कर्ण में संक्रमण पहुँचता है। डॉक्टर चाहे वह झोलाछाप हीं क्यों न हो, उसका भी दवा अवश्य काम करेगा और पूरी तरह यह बीमारी मिट जाएगी यदि आपने नीचे लिखे निर्देशों का पालन किया। कान साफ़ करने के बाद ही कान में दवा डालें। दवा के डालने के बाद कान को रुई से हमेशा बंद रखे अन्यथा हवा के संसर्ग से मवाद का आना बंद नहीं होगा। ये प्रक्रिया तीन महीने तक जारी रखें। आपको एहसास हो जायेगा कि कान से मवाद आना बंद हो गया है, लेकिन ऐसा होता नहीं है और ६ महीने या एक साल के अन्दर इसकी पुनरावृति हो जाती है। ऐसा होने पर पुनः वही प्रक्रिया चालू कर दें। इस प्रक्रिया को तीन बार करने से यह पूरी तरह ठीक हो जाती है। सावधानियां :- कान में पानी या तेल न डालें स्‍नान करते समय हमेशा दोनों कानों में कपास लगायें जब भी बहाव हो, कान साफ करने की कपास की तीली से कान साफ करें ई.एन.टी चिकित्सक से उपचार के लिए उचित परामर्श लें।

खाँसी का जड़ से इलाज

खाँसी

खाँसी खाँसी रोग कई कारणों से पैदा होता है और यदि जल्दी दूर न किया जाए तो विकट रूप धारण कर लेता है। एक कहावत है, रोग का घर खाँसी। खाँसी यूँ तो एक मामूली-सी व्याधि मालूम पड़ती है, पर यदि चिकित्सा करने पर भी जल्दी ठीक न हो तो इसे मामूली नहीं समझना चाहिए, क्योंकि ऐसी खाँसी किसी अन्य व्याधि की सूचक होती है। आयुर्वेद ने खाँसी के 5 भेद बताए हैं अर्थात वातज, पित्तज, कफज ये तीन और क्षतज व क्षयज से मिलाकर 5 प्रकार के रोग मनुष्यों को होते हैं। खाँसी को आयुर्वेद में कास रोग भी कहते हैं। इसका प्रभाव होने पर सबसे पहले रोगी को गले (कंठ) में खरखरापन, खराश, खुजली आदि की अनुभूति होती है, गले में कुछ भरा हुआ-सा महसूस होता है, मुख का स्वाद बिगड़ जाता है और भोजन के प्रति अरुचि हो जाती है। ये पाँच प्रकार का कास कई कारणों से होता है और वे कारण शरीर में अन्य व्याधियाँ उत्पन्न कर शरीर को कई रोगों से ग्रस्त कर देते हैं। इसी कारण से कहावत में 'रोग का घर खाँसी' कहा गया है। खाँसी के 5 प्रकार - 1. वातज खाँसी : वात प्रकोप के कारण उत्पन्न हुई खाँसी में कफ सूख जाता है, इसलिए बहुत कम निकलता है या निकलता ही नहीं है। कफ न निकल पाने के कारण, लगातार खाँसी वेग के साथ चलती रहती है, ताकि कफ निकल जाए। इस खाँसी में पेट, पसली, आँतों, छाती, कनपटी, गले और सिर में दर्द होने लगता है। 2. पित्तज खाँसी : पित्त प्रकोप के कारण उत्पन्न हुई खाँसी में कफ पीला और कड़वा निकलता है। वमन द्वारा पीला व कड़वा पित्त निकलना, मुँह से गर्म बफारे निकलना, गले, छाती व पेट में जलन मालूम देना, मुँह सूखना, मुँह का स्वाद कड़वा रहना, प्यास लगती रहना, शरीर में दाह का अनुभव होना और खाँसी चलना, ये पित्तज खाँसी के प्रमुख लक्षण हैं। 3. कफज खाँसी : कफ प्रकोप के कारण उत्पन्न हुई खाँसी में कफ बहुत निकलता है और जरा-सा खाँसते ही सरलता से निकल आता है। कफज खाँसी के रोगी का गला व मुँह कफ से बार-बार भर जाता है, सिर में भारीपन व दर्द रहता है, शरीर में भारीपन व आलस्य छाया रहता है, मुँह का स्वाद खराब रहता है, भोजन में अरुचि और भूख में कमी हो जाती है, गले में खराश व खुजली होती है और खाँसने पर बार-बार गाढ़ा व चीठा कफ निकलता है। 4. क्षतज खाँसी : यह खाँसी उपर्युक्त तीनों कारणों वात, पित्त, कफ से अलग कारणों से उत्पन्न होती है और तीनों से अधिक गंभीर भी। अत्यन्त भोग-विलास (मैथुन) करने, भारी-भरकम बोझा उठाने, बहुत ज्यादा चलने, लड़ाई-झगड़ा करते रहने और बलपूर्वक किसी वेग को रोकने आदि कामों से रूक्ष शरीर वाले व्यक्ति के उरप्रदेश में घाव हो जाते हैं और कुपित वायु खाँसी उत्पन्न कर देती है। क्षतज खाँसी का रोगी पहले सूखी खाँसी खाँसता है, फिर रक्तयुक्त कफ थूकता है। गला हमेशा ध्वनि करता रहता है और उरप्रदेश फटता हुआ-सा मालूम देता है। 5. क्षयज खाँसी : यह खाँसी क्षतज खाँसी से भी अधिक गंभीर, कष्ट साध्य और हानिकारक होती है। विषम तथा असात्म्य आहार करना, अत्यन्त भोग-विलास करना, वेगों को रोकना, घृणा और शोक के प्रभाव से जठराग्नि का मंद हो जाना तथा कुपित त्रिदोषों द्वारा शरीर का क्षय करना। इन कारणों से क्षयज खाँसी होती है और यह खाँसी शरीर का क्षय करने लगती है। क्षयज खाँसी के रोगी के शरीर में दर्द, ज्वार, मोह और दाह होता है, प्राणशक्ति क्षीण होती जाती है, सूखी खाँसी चलती है, शरीर का बल व मांस क्षीण होता जाता है, खाँसी के साथ पूय (पस) और रक्तयुक्त बलगम थूकता है। यह क्षयज खाँसी, टीबी (तपेदिक) रोग की प्रारंभिक अवस्था होती है अतः इसे ठीक करने में विलम्ब और उपेक्षा नहीं करना चाहिए। एलोपैथिक चिकित्सा के अनुसार खाँसी होने के कारण इस प्रकार हैं- श्वसन संस्थान की विकृतियाँ - 1. श्वसन मार्ग के ऊपरी भाग में टांसिलाइटिस, लेरिन्जाइटिस, फेरिन्जाइटिस, सायनस का संक्रमण, ट्रेकियाइटिस तथा यूव्यूला का लम्बा हो जाना आदि से खाँसी होती है। 2. श्वसनी (ब्रोंकाई) में ब्रोंकाइटिस, ब्रोंकियेक्टेसिस आदि होने से खाँसी होती है। 3. फुफुक्स के रोग, जैसे तपेदिक (टीबी), निमोनिया, ट्रॉपिकल एओसिनोफीलिया आदि से खाँसी होती है। 4. प्लूरा के रोग, प्लूरिसी, एमपायमा आदि रोग होने से खाँसी होती है। खाँसी गीली और सूखी दो प्रकार की होती है। सूखी खाँसी होने के कारणों में एक्यूट ब्रोंकाइटिस, फेरिनजाइटिस, प्लूरिसी, सायनस का संक्रमण तथा टीबी की प्रारम्भिक अवस्था का होना है। कागले के बढ़ जाने से, टांसिलाइटिस से और नाक का पानी कंठ में पहुँचने से क्षोभ पैदा होता है। गीली खाँसी होने के कारणों में क्रॉनिक ब्रोंकाइटिस, ब्रोंकियेक्टेसिस और फुक्फुसीय गुहा (केविटी) में कफ हो जाना होता है। इसे गीली खाँसी कहते हैं। अंदर फुफुस में घाव या सड़न हो तो कफ दुर्गंधयुक्त होता है। सामान्य खाँसी : दिनचर्या और दैनिक आहार में गड़बड़ होने से भी खाँसी चलने लगती है। इसे सामान्य खाँसी कहते हैं। गले में संक्रमण होने पर खराश और शोथ होने पर खाँसी चलने लगती है, खराब तेल से बना व्यंजन खाने, खटाई खाने, चिकनाईयुक्त व्यंजन खाकर तुरंत ठंडा पानी पीने आदि कारणों से खाँसी चलने लगती है। यह सामान्य खाँसी उचित परहेज करने और सामान्य सरल चिकित्सा से ठीक हो जाती है। यदि खाँसी 8-10 दिन तक उचित परहेज और दवा लेने पर भी ठीक न होती हो तो समझ लें कि यह 'रोग का घर खाँसी' वाली श्रेणी की खाँसी है और सावधान होकर तुरन्त उचित चिकित्सा करें। सावधानी - खाँसी के रोगी को कुनकुना गर्म पानी पीना चाहिए और स्नान भी कुनकुने गर्म पानी से करना चाहिए। कफ ज्यादा से ज्यादा निकल जाए इसके लिए जब-जब गले में कफ आए तब-तब थूकते रहना चाहिए। मधुर, क्षारीय, कटु और उष्ण पदार्थों का सामान्य सेवन करना चाहिए। मधुर द्रव्यों में मिश्री, पुराना गुड़, मुलहठी और शहद का, क्षारीय पदार्थों में यवक्षार, नवसादर और टंकण (सोहागे का फूला), कटु द्रव्यों में सोंठ, पीपल और काली मिर्च तथा उष्ण पदार्थों में गर्म पानी, लहसुन, अदरक आदि-आदि पदार्थों का सेवन करना पथ्य है। खटाई, चिकनाई, ज्यादा मिठाई, तेल के तले पदार्थों का सेवन करना अपथ्य है। ठंड, ठंडी हवा और ठंडी प्रकृति के पदार्थों का सेवन अपथ्य है अतः इनसे परहेज करना चाहिए। घरेलू इलाज - 1. सूखी खाँसी में दो कप पानी में आधा चम्मच मुलहठी चूर्ण डालकर उबालें। जब पानी आधा कप बचे तब उतारकर ठंडा करके छान लें। इसे सोते समय पीने से 4-5 दिन में अंदर जमा हुआ कफ ढीला होकर निकल जाता है और खाँसी में आराम हो जाता है। 2. गीली खाँसी के रोगी गिलोय, पीपल व कण्टकारी, तीनों को जौकुट (मोटा-मोटा) कूटकर शीशी में भर लें। एक गिलास पानी में तीन चम्मच जौकुट चूर्ण डालकर उबालें। जब पानी आधा रह जाए तब उतारकर बिलकुल ठंडा कर लें और 1-2 चम्मच शहद या मिश्री पीसकर डाल दें। इसे दिन में दो बार सुबह-शाम आराम होने तक पीना चाहिए।

तलवों में दर्द को कैसे मिटाएं

तलवों में दर्द को कैसे मिटाएं

तलवों में दर्द को कैसे मिटाएं तलवों में दर्द या सूजन की समस्या से परेशान लोगों के लिए बॉटल मसाज थैरेपी काफी उपयोगी होती है। इसके लिए आपको प्लास्टिक की बोतल में 1/3 पानी भर कर फ्रीजर में जमने के लिए रखना होगा। बोतल में जब बर्फ जम जाए तो उसे बाहर निकालें और आसपास का पानी पोंछ दें। फिर बोतल को एक सूखे टॉवल, कपड़े या डोरमैट पर रख दें। अब कुर्सी या सोफे पर बैठ जाएं और पैरों के तलवे के बीच वाले हिस्से को बोतल पर रखें व बोतल को तलवों की सहायता से आगे-पीछे करें। इससे आपके तलवों में रक्त संचार होगा और मांसपेशियों की हल्की मसाज होगी। इस प्रयोग को 10-15 मिनट तक कर सकते हैं। एक्यूप्रेशर रोलर - पैरों के तलवों पर एक्यूप्रेशर रोलर करनें से दर्द से राहत मिलती है। इस क्रिया में पैरों को रोलर पर रखकर धीरे-धीरे घुमाएं। यह क्रिया दिन में कई बार करनी चाहिए। इसे दो मिनट तक करना पर्याप्त रहता है। रोलर करने से पहले तलवों पर हल्का पाउडर लगाएं। इससे एक्यूप्रेशर आसानी से होगा। मसाज - पैरों को दबाने या मसाज करने से भी आराम मिलता है। तलवों को आराम देने के लिए मसाज करते समय दोनों पैरों के तलवों की ओर अंगूठे के बिल्कुल नीचे पड़ने वाले बिंदु पर दबाव दें। फिर पैरों के ऊपर छोटी उंगली के नीचे पड़ने वाले तीन बिंदुओं पर दबाव दें। इसके बाद पैरों के नीचे एड़ी पर पड़ने वाले तीन मास्टर बिंदुओं पर दबाव दें। i दर्द - दर्द मांसपेशियेां में होने वाली सामान्य संवेदना है, जिसकी शुरुआत आने वाले किसी भी संभावित चोट तथा अपनी देखभाल के प्रति सतर्क करने के लिये होती है। आमतौर पर भयंकर दर्द अचानक बीमारी या टिश्‍युओं के चोटिल होने से भी होता है। दर्द अचानक से और कुछ अवधि के लिए होता है। दर्द हल्‍का, रुक-रुककर या गंभीर भी हो सकता है। नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर्स एंड स्ट्रोक के अनुसार, इलाज के बिना तीव्र दर्द पुराने दर्द का कारण बन सकता है। पुराना दर्द के कारण अधिकतर लोगों को अन्‍य प्रकार के रोग भी घेर सकते हैं। इस स्‍लाइड शो में पुराने दर्द का प्रबंधन करने के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं। सही तरीके से सांस लेना - विस्कोसिंन यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं के अनुसार, श्वास पर ध्यान केंद्रित करना, दर्द से राहत पाने का एक अच्‍छा उपाय है। तीव्र दर्द में धीरे और गहरी सांस लेने से आप तनावमुक्‍त होकर अधिक नियंत्रित और अच्‍छा महसूस करते हैं। इसके अलावा मांसपेशियों और हड्डियों से जुड़े दर्द से राहत के लिए गहरी सांस लेना बहुत प्रभावी विकल्प है। हाइड्रेटेड रहना - डिहाइड्रेशन के कारण शरीर से मिनरल का नुकसान, पुराने सिर और पीठ दर्द को बढ़ा देता है। इसलिए सलाह दी जाती है कि दर्द से बचने के लिए तरल पदार्थो का अधिक से अधिक सेवन करें। कई लोग बॉडी को हाइड्रेटेड करने के लिए कॉफी, सोडा या जूस का सहारा लेते हैं ये बिलकुल गलत है क्‍योंकि इसमें अतिरिक्त कैलोरी, सोडियम और कैफिन समस्‍या को और अधिक गंभीर बना देता हैं। i ध्यान - वैसे तो दर्द के दौरान ध्‍यान करना बहुत म‍ुश्किल होता है लेकिन अगर आप एक बार ध्‍यान करने में सफल हो जाते हैं तो दर्द के अहसास को कम किया जा सकता है। यह बात एक अध्‍ययन द्धारा भी साबित हो गई है। 2011 के दौरान हुए एक शोध में पाया गया कि ध्यान और प्राणायाम से दर्द के एहसास को कम करने में लगभग 11 से 70 प्रतिशत तक सफलता मिल सकती है। शराब से बचें - दर्द के दौरान सोना बहुत म‍ुश्किल हो जाता है और शराब स्‍ि‍थति को और भी खराब कर देता है। इ‍सलिए अगर आप पुराने दर्द से पी‍ड़ि‍त हैं तो शराब से परहेज करके आप अपने जीवन की गुणवत्ता में सुधार कर सकते हैं। संतुलित आहार - जर्नल ऑफ़ अल्टरनेटिव एंड कॉम्प्लिमेंटरी मेडिसिन के शोध के अनुसार, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ से मुक्त आहार पुराने दर्द को कम करने में मदद करते है। हरी पत्तेदार सब्जियां, ओमेगा 3 फैटी एसिड से उच्च खाद्य पदार्थ, शतावरी और लो शुगर वाले खाद्य पदार्थ जैसे चेरी, प्‍लम, और अनानास और सोया खाद्य उत्पाद दर्द को कम करने में मदद करते हैं। तनाव को कम करें - अवसाद, चिंता, तनाव और क्रोध ऐसे नकारात्‍मक भावनाएं है, जो दर्द के लिए शरीर की संवेदनशीलता को बढ़ा सकते हैं। तनाव को कम और नियंत्रण पुराने दर्द से राहत प्राप्‍त करने में मदद कर सकता है। तनाव को कम करने का सबसे अच्‍छा तरीका है संगीत। संगीत हर दर्द की दवा है। अगर आप संगीत के शौकीन हैं तो इससे बेहतर दर्दनिवारक आपके लिए कोई और हो ही नहीं सकता। हल्दी का इस्‍तेमाल - पीले रंग का यह मसाला अपने एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों के लिए जाना जाता है। हल्‍दी पुराने दर्द सहि‍त कई स्‍वास्‍थ्‍य स्थितियों के इलाज के लिए फायदेमंद होती है। हल्‍दी में पाया जाने वाला करक्युमिन नामक तत्‍व शरीर में होने वाले दर्द को कम करने में मदद करता है। योग - योग पुराने दर्द को दूर करने का एक सरल और आसान तरीका है। यह न केवल शक्ति और लचीलेपन को बढ़ावा देता है बल्‍िक मन को शांत और तनाव को कम करने में भी मदद करता है। सदियों से योग तनाव को कम करके पुराने दर्द से पीड़‍ित लोगों की मदद करने का एक आसान तरीका है। बैठने की सही मुद्रा - शरीर को सही मुद्रा में बनाये रखने से दर्द को कम करने में मदद मिलती है और यह भविष्य में होने वाले दर्द को भी रोकता है। इसके अलावा अगर आपको कंप्यूटर के सामने कई घंटों तक बैठना पड़ता है तो यह जरूरी है कि आप नियमित अन्तराल से ब्रेक लें। जर्नल ऑफ न्यूरोसाइंस के अनुसार, बैठने की सी-स्लंप मुद्रा तंत्रिका और रक्त प्रवाह को ख़राब कर सकती है। इसलिए सही मुद्रा के लिए, पीठ और गर्दन की मांसपेशियों पर तनाव को रोकने के लिए सिर और रीढ़ की हड्डी को सीधा करके रखें। दर्द के बारे में बात करें - अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के अनुसार, दर्द के बारे में बात करने से इसे कम करने में मदद मिल सकती है। कुछ आम तकनीक जैसे संज्ञानात्मक व्यवहार थेरेपी, बायोफीडबैक और निर्देशित काल्पनिक शामिल हैं। यह सभी तकनीक तनाव का प्रबंधन कर दर्द को कम करने में मदद करती है।

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम

इरिटेबल बाउल सिंड्रोम इरिटेबल बाउल सिंड्रोम यानी आईबीएस आंतों की एक ऐसी बीमारी है जो मरीज़ की दिनचर्या में बाधा डालने लगती है। यह आंतों को डैमेज तो नहीं करती,मगर इसके लक्षण यह ज़रूर बताते हैं कि पेट के अंदर कुछ गड़बड़ चल रही है जिसे जल्द ही ठीक करने की ज़रूरत है। आईबीएस यानी आंतों में होने वाली अकड़न जिससे पेट में दर्द बना रहता है। इसे स्पैस्टिक कोलन, इरिटेबल कोलन, म्यूकस कोइलटिस जैसे नामों से भी जाना जाता है। इससे न केवल व्यक्ति को शारीरिक तकलीफ महसूस होती है, बल्कि उसकी पूरी जीवनशैली प्रभावित हो जाती है। यह आंतों को खराब तो नहीं करता लेकिन उसके संकेत देने लगता है। पुरुषों की तुलना में महिलाएं इस बीमारी से अधिक प्रभावित होती हैं। वैसे यह आंत या पेट के कैंसर के खतरे को नहीं बढ़ाता है लेकिन जीवन को अस्त-व्यस्त कर देता है। क्या हैं लक्षण - -पेट में मरोड़ उठना -पेट में दर्द और सूजन -लगातार कब्जियत का बना रहना -बार-बार डायरिया जैसे लक्षण इसके कारण - आईबीएस के सही कारणों का अब तक पता नहीं चला है। डॉक्टर्स मानते हैं कि संवेदनशील कोलन या कमजोर रोग-प्रतिरोधक क्षमता के कारण यह समस्या पैदा हो सकती है। कई बार पेट में बैक्टीरियल इंफेक्शन के कारण भी आईबीएस हो सकता है। इसके कुछ खास कारण भी हैं जो अलग-अलग रोगियों में भिन्न हो सकते हैं- -कोलन का कमजोर मूवमेंट, जिससे मरोड़ के साथ काफी दर्द होता है। -कोलन में सेरोटोनिन की अनियंत्रित मात्रा, जिससे आंतों का मूवमेंट प्रभावित होता हैं। -माइल्ड सेलिएक डिसीज के आंतों को डैमेज करने के कारण आईबीएस के लक्षण उभरने लगते हैं। संभव है इलाज - आईबीएस का ऐसा कोई निश्चित इलाज नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों से राहत जरूर मिलती है। इसके लिए कोई दवा आरंभ करने से पहले जीवनशैली में बदलाव की जरूरत होती है। इससे राहत पाने के लिए कुछ खास चीजों का ध्यान रखना भी जरूरी होता है। -रोजाना व्यायाम करें। -तनाव से बचें। -कैफीनयुक्त चीजें कम से कम लें। -खाना कम मात्रा में कई बार लें। - तले-भुने और स्पाइसी खाने से दूर रहें। - प्रोबायोटिक प्रोडक्ट्‌स लें जैसे दही आदि। कैसे होती है पहचान - मरीज के लक्षणों के आधार पर आईबीएस का पता लगाना आसान होता है। कुछ खास प्रकार की डाइट का सुझाव दिया जाता है या फिर खाने में से कुछ चीजें कम कर दी जाती हैं, जिससे यह पता लगाया जा सके कि कहीं ये लक्षण किसी फूड एलर्जी के कारण तो नहीं है। स्टूल सैंपल के आधार पर इंफेक्शन का पता लगाया जाता है और ब्लड टेस्ट किया जा सकता है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि रोगी एनिमिया से तो पीड़ित नहीं है। इसके आधार पर सेलिएक डिसीज यानी ग्लूटेन इनटोलरेंस का पता भी लगाया जाता है। इसकी जांच के लिए कोलनस्कॉपी की जाती है। इस टेस्ट के जरिए डॉक्टर कोलन की जांच करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर टिशू सैंपल लिए जाते हैं। इससे इस बात का पता लगाना आसान हो जाता है कि कहीं ये सारे लक्षण किसी और बीमारी के कारण तो नहीं है, जैसे कोलाइटिस या कोई अन्य क्रॉनिक डिसीज। मरीज की उम्र ५० वर्ष से अधिक है तो भी इस जांच की आवश्यकता पड़ती है।

एलर्जी का इलाज

एलर्जी

एलर्जी कई लोगों को गाय के दूध, मछली या फिर अंडे से एलर्जी हो सकती है। कई बार ऐसा भी होता है कि जिस खाद्य पदार्थ से आपको एलर्जी हो, उससे जुड़े खाद्य पदार्थ समूह से एलर्जी हो गई हो। ऐसे में उनका सेवन करते ही परेशानी शुरू हो जाती है। पानी में मिले कैमिकल्स आपके चेहरे की झुर्रियों का कारण बन सकते हैं। चूंकि ये शरीर द्वारा सीधे सोख लिए जाते हैं, इसलिए इनसे एलर्जी होने का खतरा भी अधिक होता है। पानी में जब क्लोरीन मिला होता है, तब वह अधिक नुकसानदेह हो जाता है। इसलिए कहा जाता है कि जब भी आप स्विमिंग करें तो उसके बाद साफ पानी से जरूर नहा लें। प्रदूषण से बचें - हवा से भी एलर्जी हो सकती है। पानी के साथ ही प्रदूषण युक्त हवा भी त्वचा को बैक्टीरिया के संपर्क में ले आती है, जिससे एलर्जी होने का खतरा रहता है। टैटू का त्वचा पर बुरा प्रभाव देखा गया है। इस तरह की शिकायतें आजकल आम हैं। युवाओं द्वारा बनवाए जाने वाले अस्थायी टैटू में इस्तेमाल होने वाली खराब स्याही से त्वचा में जलन हो जाती है। कपड़ों से भी हो सकती है एलर्जी - डर्मेटोलॉजिस्ट डॉं. शेहला अग्रवाल के अनुसार, ‘कपड़ों से भी एलर्जी हो सकती है। कभी-कभी कपड़ों पर इस्तेमाल होने वाला रंग यानी डाई त्वचा में एलर्जी पैदा कर देती है। वाशिंग मशीन में धुले कपड़ों से अगर साबुन ठीक से न निकला हो तो भी इससे त्वचा में खिंचाव आदि की समस्याएं होती हैं। मौसम में बदलाव भी स्किन एलर्जी का कारण हो सकता है। मौसम बदलने से हवा में पोलिन्स की संख्या बढ़ जाती है, जो त्वचा में एलर्जी का मुख्य कारण होती है।’ एलर्जी का असर - एलर्जी से आपको दर्द, खुजली, घाव हो जाना आदि समस्याएं हो सकती हैं। अगर सही समय पर इस पर ध्यान न दिया जाए तो आप त्वचा रोग के भी शिकार बन सकते हैं। इसके अलावा कई बार प्लास्टिक की चीजों जैसे नकली आभूषण, बिंदी, परफ्यूम, चश्मे के फ्रेम, साबुन आदि से भी एलर्जी हो जाती है। इस तरह की एलर्जी को कॉन्टेक्ट डर्मेटाइटिस कहा जाता है। ऐसे दूर करें असर - -फिटकरी के पानी से प्रभावित स्थान को धोकर साफ करें। जिस स्थान पर एलर्जी हो, वहां कपूर और सरसों का तेल लगाएं। आंवले की गुठली जला कर राख कर लें। उसमें एक चुटकी फिटकरी और नारियल का तेल मिला कर पेस्ट बना लें। इसे लगाते रहें। -खट्टी चीजों, मिर्च-मसालों से परहेज रखें। रोज सुबह नींबू का पानी पिएं। -चंदन, नींबू का रस बराबर मात्रा में मिला कर पेस्ट बना कर लगाएं।

डायबिटीज - (मधुमेह) - कारण , लक्षण व बचाव

डायबिटीज - (मधुमेह) - कारण , लक्षण व बचाव

डायबिटीज - (मधुमेह) - कारण , लक्षण व बचाव भारत में डायबिटीज रोगियों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि हुई है जिसकी वजह आधुनिक जीवन शैली और आहार में अनियमितता है । यह दीर्घकालीन रोग एक धीमी मौत की तरह रोगी के गुर्दों को नष्ट कर देता है एवं हृदय रोग, तात्रिंकाओं की बीमारियां ,अंधापन और गैंगरीन भी इसी रोग की देन है । ज्यादातर लोग टाइप 2 डायबिटीज से पीड़ित हैं जिसकी वजह है मोटापा, चलने-फिरने और कसरत की कमी । डायबिटीज का कोई स्थायी इलाज नहीं है परन्तु जीवन शैली में बदलाव, शिक्षा तथा खान-पान की आदतों में सुधार द्वारा इस रोग को पूरी तरह नियंत्रित किया जा सकता है । स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही तथा अशिक्षा ही डायबिटीज का प्रमुख कारण है । यदि रोग बढ़ जाए तो भी एलौपेथी तथा आयुवैदिक दवाओं, इंसुलिन व जीवन शैली में बदलाव द्वारा रोग पर काबू पाया जा सकता है । डायबिटीज जो कि हाइपरग्लाइसीमिया, हाई शुगर, हाई ग्लूकोज, मधुमेह, ग्लूकोज इनटोलरेंस नाम से भी जाना जाता है । इस रोग में ग्लोकोज का स्तर बढ़ जाता है तथा शरीर की कोशिकाएं शर्करा का उपयोग नहीं कर पाती हैं । यह रोग ‘‘ इन्सुलिन’’ नामक हार्मोन की कमी से होता है जो कि शरीर की पैन्क्रीयास ग्रन्थि से निकलता है । डायबिटीज के प्रकार - डायबिटीज मुख्य रूप से 3 प्रकार की होती है पहली टाइप 1 डायबिटीज, दूसरी टाइप 2 डायबिटीज और गैस्टेशनल डायबिटीज (1) टाइप 1 डायबिटीज - आमतौर में यह बीमारी मुख्यतः बचपन या युवावस्था (12 से 25 साल की उम्र) में होती है । वायरल संक्रमण से पैन्क्रियाज के बीटा कोशिकाएं पूर्णतः नष्ट हो जाती हैं जिसके कारण इन्सुलिन की आवश्यक मात्रा उत्पन्न नही कर पाते हैं इसलिए इसकी आवश्यकता को पूरा करने के लिए इंसुलिन लेना आवश्यक हो जाता है । इसके मरीज बहुत पतले होते हैं । भारत में लगभग 1 से 2 प्रतिशत टाइप 1 डायबिटीज के रोगी पाये जाते हैं । (2) टाइप - 2 डायबिटीज - विश्व में ज्यादरतर लोग टाइप 2 डायबिटीज रोग से पीड़ित है जिसकी वजह मोटापा है । लगभग 95 से 98 प्रतिशत भारतीयों में टाइप 2 डायबिटीज के पाया जाता है जो कि 40 वर्ष की उम्र के आसपास शुरू होता है । इस तरह के लोग मोटे होते हैं और ज्यादातर उनका पेट निकला होता है उनका पारिवारिक इतिहास (अनुंवाशकीय) होता है । उनका रोग धीरे धीरे बढ़ता है और काफी लम्बे समय तक लक्षण दिखाई नहीं देते हैं । इस टाइप की डायबिटीज में शुरू में इंसुलिन का उत्पादन ठीक रहता है पर कुछ समय बाद इंसुलिन की कमी होने से मरीज डायबिटीज का रोगी बन जाता है तब शर्करा निंयत्रित करने के लिए दवाएं लेनी शुरू करनी पड़ती हैं । टाइप 2 डायबिटीज कभी खत्म ना होने वाली बिमारी है । (3) गेस्टेशनल डायबिटीज - महिलाओं के गर्भवती होने के दौरान उसका रक्त शर्करा स्तर सामान्य से बढ़ा होना गेस्टेशनल डायबिटीज बतलाती है । गर्भावस्था में होने वाले हार्मोन परिवर्तन इन्सुलिन के कार्य को प्रभावित करते हैं और ये रक्त शर्करा बढ़ाते हैं इसके लिए ग्लूकोज टालरेन्स टेस्ट करवायें । सभी महिलाओं केा 12 वे एवं 24-28 हफते में यह टेस्ट करवाना चाहिए । डायबिटीज के शुरूआती लक्षणों को पहचाने - आज डायबिटीज एक आम समस्या बनती जा रही है कई लोगों में यह बीमारी शुरू हो जाती है पर उन्हें पता ही नहीं चल पाता इसलिए यह बहुत जरूरी है कि आप इस बीमारी के लक्षणों को पहचाना सीख लें - थकान महसूस होना, लगातार पेशाब लगना और अत्याधिक प्यास लगना, आंखें कम जोर होना जिसमें किसी भी वस्तु को देखने के लिए उसे आंखों पर जोर डालना पड़ता है, अचानक कम होना, घाव का जल्दी न भरना, तबियत खराब रहना इसमें शरीर में किसी तरह का संक्रमण जल्दी से ठीक न होना, यह आनुवांशकीय हो सकता यदि आपके परिवार में किसी अन्य सदस्य को भी डायबिटीज हो चुका हो, सावधान हो जाने की जरूरत है । पुरूषों में डायबिटीज के लक्षण - बार बार पेशाब आना, बहुत ज्यादा प्यास लगना, बहुत पानी पीने के बाद भी गला सूखना, खाना खाने के बाद भी भूख लगना, हर समय कमजोरी और थकान की शिकायत होना, मितली होना और कभी कभी उल्टी होना, हाथ-पैर में अकड़न और शरीर में झंझनाहट होना, आंखों में धुंधलापन होना, त्वचा या मूत्रमार्ग में संक्रमण, त्वचा में रूखापन आना, चिड़चिड़ापन, सिरदर्द, शरीर का तापक्रम कम होना, मांसपेशियों में दर्द और वजन कम होना इत्यादि । महिलाओं में डायबिटीज के लक्षण - अत्यधिक प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, भूख में वृद्धि, अत्याधिक थकान, वजन में कमी, धुंधला विजन, धीरे धीरे घाव का भरना, जननांग में खुजली या नियमित चिड़िया , महिलाओं में कम उम्र में डायबिटीज का खतरा रहता है । डायबिटीज रोग के कारण - डायबिटीज का प्रमुख कारण है पैन्क्रीयास ग्रन्थि की विकृति हो जो कि आहार-विहार की गड़बड़ी के कारण उत्पन्न होती है, आहार में मीठा, अम्ल और लवण रसों की अत्यधिक सेवन, आराम तलब जीवन व्यतीत करने से तथा व्यायाम एवं परिश्रम न करने से, अधिक चिंता एवं उद्वेग के परिणाम स्वरूप, आवश्यकता से अधिक कैलोरी वाले, शर्करा तथा वसा युक्त भोजन करने से यह रोग उत्पन्न होता है । डायबिटीज आनुवांसकीय भी हो सकता है । डायबिटीज के रोगी क्या करें - चिंता, तनाव क्रोध, शोक, व्यग्रता से मुक्त रहें, हर माह में रक्त शर्करा की जांच, भोजन कम करें, भोजन में रेशेयुक्त, तरकारी, जौ, चने, गेंहू, बाजरे की रोटी, हरी सब्जी, दही का प्रचुर मात्रा में सेवन करें, हल्का व्यायाम करें, शरीरिक परिश्रम करें, और प्रातः 4 से 5 किलोमीटर घूमें, डायबिटीज पीड़ित नियमित एवं संयमित जीवन पर ध्यान दें, शर्करीय पदार्थो का सेवन सीमीत करें, मोटे और भारी वजन वाले व्यक्ति अपना वनज कम करें, ब्रहमचर्य का पालन करें, नित्य प्राणायाम एवं सूर्य नमस्कार अवश्य करें, नगें पैर जमीन पर अवश्य चलें । डायबिटीज के मरीजों को प्यास ज्यादा लगती है वे इसे नीबू पानी से प्यास बुझांए, भूख मिटाने के लिए खीरा खायें साथ ही गाजर और पालक का रस पीयें । तरोई, लौकी, परबल, पालक, पपीता का अधिक सेवन करें, शलजम रक्त में शर्करा की मात्रा कम करता है। चमत्कारी है गेंहू के जवारे का रस इसे ग्रीन ब्लड भी कहते हैं इसे सुबह-शाम आधा कम ज्वारे का ताजा रस पीयें । डायबिटीज के घरेलू इलाज- करेला जिसमें कैरेटिन जो कि प्राकृतिक स्टेरायॅड है रक्त में शर्करा का लेवल बढ़ने नहीं देता है करेले का 100 मि.ली. रस दिन में तीन बार लें , मैथी दाना 50 ग्राम नियमित लें, जामुन के फल के रस में ‘‘जाम्बोलिन’’ तत्व एवं पत्ती और बीज डायबिटीज को जड़ से समाप्त कर सकता है, जामुन के सूखे बीजों के पाउडर एक चम्मच दिन में दो बार लें, आमला- आमला एवं करेले का रस बराबर मात्रा में मिला कर पीना लाभदायक है, नीम के 7 पत्ते खाली पेट चबाकर पानी पियें, सदाबहार के 7 फूल खाली पेट पानी के साथ चबायें काफी लाभकारी, बिल्व पत्र की 7 पत्तियां (एक पत्ती में 3 पत्तियां) एवं 5 काली मिर्च पीस कर सुबह के समय खाली पेट 1 माह तक लें, शिलाजीत 1 ग्राम प्रातः व शाम दूध के साथ लें । इंसुलिन का उपयोग हमेशा डाक्टर की निगरानी में आवश्यक है । दवा और जीवन शैली नुस्खों का प्रबंधन जरूरी है । आज स्टेम सेल थैरेपी हमें डायबिटीज से मुक्ति दिला सकती है इसमें बोन मैरो व अम्बिलिकल काॅड से स्टेम कोशिकाएं निकालते हैं और उन कोशिकाओं को पैन्क्रियाज की बीटा कोशिकाएं बनने लगती है और साथ ही बनने लगती हैं इंसुलिन, पूरी प्रक्रिया मं 24 दिन लगते हैं और इलाज का खर्च 3 लाख आता है और सफलता 70 प्रतिशत पाई गई है ।

दाद लक्षणों को पहचानें

दाद लक्षणों को पहचानें

दाद लक्षणों को पहचानें दाद यानी की रिंगवार्म एक चर्म रोग है. यह फंगल इन्फेक्शन की वजह से होता है. दाद व्यक्ति की हथेलियों, एडियों, खोपडी, दाढी तथा शरीर के किसी भी भाग में हो सकता है. दाद शरीर के जिस भाग पर होता है उस भाग पर खुजली मचती है और जब व्यक्ति इसे खुजलाने लगता है तो यह और भी फैलने लगता है. गीलेपन, नमी और भीड-भाड वाली जगह पर यह ज्यादा फैलता है. साथ ही यह संक्रमित इंसान से उसके सामानों को प्रयोग करने से फैलता है. अगर आपने उसकी कंघी, तौलिया या बेड प्रयोग कर लिया तो यह आप तक आराम से पहुंच जायेगा. इस समस्या को पूरी तरह से ठीक होने में कई हफ्ते लग सकते हैं. लक्षणों को पहचानें - जब शरीर पर लाल रंग के धब्बे, खुजलाहट या फिर सूजन दिखे, तो उसको जल्द से जल्द डॉक्टर को दिखा लेना चाहिए. क्योंकि यह रिंगवार्म के संकेत हो सकते हैं. कई बार यह दाग गोल आकार का होता है जिससे आसानी से समझ में आ जाता है. अकसर दाद छोटे बच्चों को होता है इसलिये अगर उसके शरीर पर कोई लाल रंग का दाग-धब्बा दिख रहा हो तो तुरंत डॉक्टर के पास उसे ले जायें. जॉक खुजली एक तरह का दाद होता है जो कि त्वचा की परतों में होता है. अगर यह रोग हाथ पर होता है तो हाथ पूरी तरह से फूल जाता है. त्वचा पर तेज खुजली होती है और उस पर परत बन जाती है. ऐसे करें उपचार - टीवी पर दाद के अनेक प्रचार आते हैं, लेकिन कभी भी ऐसे ही कोई क्रीम या दवा नहीं खरीदनी चाहिए. इसके लिए हमेशा कैमिस्ट या डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए. दाद रोग से पीडित रोगी को इस रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले दाद वाले भाग पर थोडी देर गर्म तथा थोडी देर ठंडी सिंकाई करके, उस पर गीली मिट्टी का लेप करना चाहिए. इससे दाद जल्दी ही ठीक हो जाता है. रोगी व्यक्ति को नींबू का रस पानी में मिलाकर प्रतिदिन कम से कम ५ बार पीना चाहिए और सादा भोजन करना चाहिए. संक्रमित त्वचा को हमेशा साफ रखें और ऐसी कोई भी चीज ना पहने जिससे त्वचा को परेशानी हो. अपनी बेडशीट, कपडे तथा रोज प्रयोग किये जाने वाले सामानों को साफ रखें. घर में अगर पालतू जानवर हैं, तो उनसे दूर रहें. क्योंकि यह अपने शरीर पर फंगस ले कर घूमते रहते हैं. बालों में शैंपू करें और हमेशा चप्पल पहनें. किसी का भी तौलिया, कंघी या फिर कपडे प्रयोग न करें. इससे संक्रमण आसानी से फैलता है.